हमारे यहां पांच तरह के धोखे, ऑनलाइन अधिक

 धोखाधड़ी के मामले आए दिन सामने आ रहे हैं। हमारे देश में पांच तरह की धोखाधड़ी होती है। इसमें ऑनलाइन धोखाधड़ी ज्यादा हो रही है। क्रेडिट, डेबिट कार्ड या बैंक से संबंधित धोखाधड़ी होने पर पीड़ित व्यक्ति पहले पुलिस के पास एफआईआर लिखाने भागता है। उसे पुलिस की बजाय पहले बैंक के पास जाना चाहिए।

हमारे यहां पांच तरह के धोखे, ऑनलाइन अधिक

6 वर्ष पहले


धोखाधड़ी के मामले आए दिन सामने आ रहे हैं। हमारे देश में पांच तरह की धोखाधड़ी होती है। इसमें ऑनलाइन धोखाधड़ी ज्यादा हो रही है। क्रेडिट, डेबिट कार्ड या बैंक से संबंधित धोखाधड़ी होने पर पीड़ित व्यक्ति पहले पुलिस के पास एफआईआर लिखाने भागता है। उसे पुलिस की बजाय पहले बैंक के पास जाना चाहिए।


हाल ही में कन्ज्यूमरफ्रॉड्स डॉट कॉम में एसबीआई के ग्राहकों की बैंकिंग जानकारी की धोखाधड़ी से संबंधित एक शिकायत की गई है। जहां पर उनके डेबिट कार्ड की जानकारी लेने के बाद उनके खाते से पैसे निकाल लिए गए। ऐसी कई नकली कंपनियां हैं, जो नौकरी के झूठे वादे करके लोगों से पैसे ठगती हैं। कई बार बैंक खातों की जानकारी मांगकर ठग लिया जाता है। भारत में मुख्य रूप से 5 प्रकार की धोखाधड़ी ज्यादा होती है।

पहचान पत्र की धोखाधड़ी : किसी पहचान पत्र को चुराकर धोखा करना।

आॅनलाइन या डिजिटल धोखा : इंटरनेट से उपभोक्ताओं के बैंक खाते, क्रेडिट कार्ड, ई-मेल आदि को अनाधिकृत लेन-देन के लिए एक्सेस कर धोखा दिया जाता है।

व्यक्तिगत धोखेबाजी : अगर किसी अन्य की पावर ऑफ अटर्नी है और उस राशि का प्रयोग व्यक्तिगत काम के लिए उक्त व्यक्ति करता है, तो यह धोखा है।

शेयरों की बिक्री और निवेश में धोखा : प्रोफेशनल स्टाॅक ब्रोकर आकर्षक निवेश अवसर बताकर दोगुना मुनाफे का प्रलोभन देता है। निःशुल्क रिसर्च रिपोर्ट, विशेष छूट और ‘गुप्त’ स्टाॅक टिप्स का वादा भी किया जाता है। ये झूठे शेयर सर्टिफिकेट या अन्य दस्तावेज तक प्रदान कर सकते हैं। ये एक बार में ज्यादा से ज्यादा पैसा निकलवाकर गायब हो जाते हैं।

बीमा में धोखाधड़ी : बीमा एजेंट होने का दावा करके कोई किसी से बीमा राशि लेता है। लेकिन जब बीमे का दावा किया जाता है या बीमा पाॅलिसी की जांच की जाती है तो पीड़ित को पता चलता है कि उसका बीमा तो है ही नहीं। या फिर उसने जो भुगतान किया है, बीमा उतने का नहीं है, तो यह धोखा है।


उपभोक्ताओं के लिए कानून : उपभोक्ता अधिकार वे हैं, जो एक ‘उपभोक्ता’ को सेल्समैन/उत्पादक द्वारा छल होने पर उसका भुगतान हासिल करने के लिए दिए हैं।


उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम : उपभोक्ताओं के हितों की बेहतर रक्षा करने के लिए संविधान में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का प्रावधान है। उपभोक्ताओं के लिए कुल 26 अधिकारों को सूचीबद्ध किया है लेकिन इन्हें 6 मूलभूत अधिकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है।


- किसी नुकसानदायक उत्पादों और सेवाओं से सुरक्षा का अधिकार।

- सभी उत्पादों, सेवाओं के प्रदर्शन और गुणवत्ता की पूरी जानकारी का अधिकार।

- उत्पादों और सेवाओं को चुनने की स्वतंत्रता का अधिकार।

- उपभोक्ता के हितों के संबंध में सभी निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में सुने जाने का अधिकार।

- जहां उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन होता है, वहां हर्जाना पाने का अधिकार।

- प्रत्येक सेवा के बारे में जानकारी।

धोखा होने पर लोग प्रायः पुलिस स्टेशन जाते हैं और एफआईआर दर्ज करवाते हैं। लेकिन, ऐसे दो स्थान हैं जहां उस व्यक्ति को जाना चाहिए। ये स्थान धोखाधड़ी के प्रकार पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए, क्रेडिट कार्ड ऋण का धोखा होने पर सबसे पहले संबंधित बैंक में जाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके खाते को सुरक्षित तौर पर बंद कर दिया जाए।

इसी प्रकार से, लोगों को इंटरनेट पर मौजूद विभिन्न उपभोक्ता फोरमों पर भी इस मामले को ले जाना चाहिए। ऐसी विभिन्न उपभोक्ता अदालतें भी हैं जिन्हें जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर शामिल धोखाधड़ी के आकार के अनुसार स्थापित किया है। पीड़ित अगर वकील की सेवाएं नहीं ले सकता है या नहीं लेना चाहता है तो वह खुद मुकदमा लड़ सकता है। उपभोक्ता विवादों से संबंधित मामलों में निवेदन की शीर्ष संस्था नेशनल कन्ज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (एनसीडीआरसी) है। इसमें न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं। उपभोक्ता अदालत का शुल्क सिर्फ 100 रुपए आता है। आज कल उपभोक्ता अदालतों में अंग्रेजी के अलावा पर किसी भी अन्य स्थानीय भाषा में केस दर्ज करवाया जा सकता है।


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